जेल अफसरों-कर्मियों को आईजी की विदाई का इंतजार
31 मई को सेवानिवृत हो रहे आईजी जेल पीवी रामाशास्त्री 11 माह के कार्यकाल में चुनिंदा को छोड़कर सभी कर्मी रहे अजिज
लखनऊ। कारागार मुख्यालय के विभागाध्यक्ष आईजी जेल के 11 माह के कार्यकाल से विभाग के अधिकारी और कर्मचारी इस कदर अजिज आ गए हैं कि अब वह विभागाध्यक्ष की विदाई का इंतजार कर रहे हैं। आईजी जेल पीवी रामाशास्त्री 31 मई को सेवानिवृत हो रहे है। दिलचस्प बात यह है कि मुख्यालय से हटाए गए कर्मी (बाबू) आईजी जेल के रहते हुए वापस तक नहीं आना चाहते हैं। कारागार मुख्यालय में बिताए 11 माह के अल्प कार्यकाल में आईजी जेल ने दर्जनों की संख्या में अधिकारियों और बाबुओं को स्पष्टीकरण और नोटिसें देकर उनकी नींद उड़ा रखी है। सेवानिवृत का इंतजार कर रहे अधिकारी और कर्मचारी आईजी जेल के रिटायर होने के बाद ही राहत की सांस लेंगे।
बीते वर्ष जून माह के अंत में पुलिस महानिदेशक पीवी रामाशास्त्री ने कारागार मुख्यालय में बतौर आईजी जेल के रूप में कार्यभार संभाला था। सूत्रों का कहना है प्रभार संभालने के कुछ माह तक तो आईजी जेल विभाग की कार्यप्रणाली को समझ ही नहीं पाए। आईजी के प्रभार संभालने के समय मुख्यालय में विभाग के समझ रखने वाला सिर्फ एक ही वरिष्ठ अधिकारी मौजूद था। यह अधिकारी विभाग के चापलूस अधिकारियों को रास नहीं आ रहा था। सूत्रों की माने तो तो विभाग के कुछ चापलूस जानकारों (कथित) सलाहकारों से आईजी जेल के करीब पहुंचकर पहले तो इस विभाग के जानकार अधिकारी को बगैर किसी आदेश के जेल प्रशिक्षण संस्थान (जेटीएस) भेजवाया। करीब डेढ़ साल तक जेटीएस का प्रभार संभालने वाले अधिकारी को राजधानी से दूर की एक जेल परिक्षेत्र की जिम्मेदारी सौंपकर उन्हें किनारे करवा दिया गया।
| रिटायरमेंट से पहले महानिरीक्षक कारागार (आईजी जेल) को तबादले करने का मौका मिल ही गया। विभाग में स्थानांतरण की जिम्मेदारी आईजी जेल के साथ एआईजी जेल प्रशासन की होती है। एआईजी प्रशासन की ओर से जेलर, डिप्टी जेलर और वार्डर संवर्ग की सूची तैयार कराई जाती है। बीते स्थानांतरण सत्र में बड़ी संख्या में तबादले किए गए थे। चहेते अधिकारियों और कर्मियों को कमाऊ जेलों पर तैनात करने के लिए जमकर वसूली की गई थी। सूत्रों की माने तो एआईजी प्रशासन को जेल गतिविधियों की जानकारी भले ही न हो लेकिन सेटिंग गेटिंग के मामले में उन्होंने महारत हासिल कर रखी है। इस संबंध में जब एआईजी प्रशासन धर्मेंद्र सिंह से बात करने का प्रयास किया गया तो कई प्रयासों के बाद भी उनका फोन नहीं हुआ। मैसेज का भी उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। |
सूत्र बताते हैं कि विभाग के कथित सलाहकारों ने आईजी जेल को विश्वास मे लेकर जेलों में बंदियों को अल्फाबेटिकली रखने सरीखे कई अटपटे आदेश जारी करवा दिए। जिससे जेलों की व्यवस्थाएं सुधरने के बजाए जेल अफसरों की वसूली जरूर बढ़ गई। यही नहीं आईजी जेल को विभाग की जानकारी नहीं होने का खास लाभ मुख्यालय के बाबुओं ने भी खूब उठाया। सूत्रों का कहना है कि आईजी की डिक्टेशन के बाद तैयार किए गए ड्राफ्ट लेटर पर साइन कराने जब बाबू आईजी के सामने पेश हुआ तो उसने आईजी को गुमराह करने का प्रयास किया। इस पर आक्रोशित आईजी ने बाबू को हटाने के साथ बर्खास्त किए जाने तक धमकी दी। एक वरिष्ठ अधिकारी ने हस्तक्षेप कर मामले को शांत कराया। यह मामला अभी निपट भी नहीं हो पाया था कि इसी बाबू ने एक फिर बड़ी गलती कर अपने चहेते व्यक्ति का लाभ पहुंचाने का प्रयास किया। इस गलती पर आईजी जेल ने बाबू को मुख्यालय से हटाकर गोरखपुर जेल परिक्षेत्र कार्यालय पर ड्यूटी लगा दी। सूत्रों का कहना है आईजी की दहशत का यह आलम है कि बाबू उनके जाने से पहले मुख्यालय वापस आने को ही तैयार नहीं है। यह तो बानगी भर है इसी प्रकार आईजी जेल ने कायों में शिथिलता और लापरवाही बरतने के आरोप में दर्जनों की संख्या में मुख्यालय के अधिकारियों और बाबुओं को स्पष्टीकरण व नोटिसें जारी कर रखी है। इन झंझावतों की वजह से मुख्यालय के चहेते कर्मियों को छोड़कर सभी अधिकारियों और कर्मियों को आईजी की विदाई का इंतजार है।


