भ्रष्टाचार सुखियों में आने पर बढ़ जाती डीआईजी जेल की वसूली!
प्रदेश की जेलों में घटनाओं के बाद नहीं हो रही कोई कार्रवाई दंडित नहीं किए जाने से बेखौफ और बेलगाम हुए जेल अफसर
लखनऊ। प्रदेश की जेलों में व्याप्त भ्रष्टाचार के सुर्खियों में आने पर दोषियों की खिलाफ कार्रवाई हो न हो लेकिन इससे परिक्षेत्र के डीआईजी की वसूली जरूर बढ़ जाती है। यह बात हम नहीं विभागीय अधिकारी कह रहे है। मुख्यमंत्री की भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के बावजूद कारागार विभाग के अधिकारियों पर इसका कोई असर दिखाई नहीं पड़ रहा है।यही वजह है कि इस विभाग में भ्रष्टाचार के मामले सुर्खियों में आने के बाद भी दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही नहीं की जाती है। इससे जेल अफसर बेखौफ होने के साथ बेलगाम भी हो गए है।
सूत्रों का कहना है कि वर्तमान समय में प्रदेश की जेलों में अधिकारियों ने लूट मचा रखी है। विभाग में भ्रष्टाचार की शिकायत मिलने पर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाए उन्हें बचा लिया जा रहा है। बीते दिनों फतेहगढ़ जेल में जेलर की न्यायालय में अभद्रता के मामले में जेलर के साथ अधीक्षक को भी हटा दिया गया। वहीं एटा जेल पर जेलर के सरकारी आवास पर महिला के हंगामे के बाद अधीक्षक को छोड़िए दोषी जेलर के खिलाफ भी कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसी प्रकार बागपत जेल में महिला डिप्टी जेलर की शिकायत पर प्रभारी अधीक्षक (जेलर) को हटा दिया गया। राजधानी की आदर्श कारागार में प्रशिक्षक की पिटाई के आरोपी दो डिप्टी जेलरों को बचाने के लिए मामले को पांच माह तक दबाए रखा गया। मामले की शिकायत आयोग में होने और तलब किए जाने पर अस्थाई ड्यूटी पर लगाए गए डिप्टी जेलर को रिलीव करने में एक पखवारा बीत गया। दूसरे डिप्टी जेलर को राजधानी के निकट स्थित बाराबंकी जेल पर लगा दिया गया। वही पिटाई का शिकार हुए प्रशिक्षक को मामले की पैरवी न करने पाए इसके लिए फतेहगढ़ जेल पर लगाकर मामले को निपटा दिया गया।
जेलों पर अफसरों की अस्थाई ड्यूटी बन गई स्थाई ड्यूटी!
जेलों पर दंडित किए गए अधिकारियों और सुरक्षाकर्मियों की अस्थाई ड्यूटी लगाने में भी बड़ा खेल चल रहा है। विभाग में कर्मियों की अस्थाई ड्यूटी दो माह, तीन माह और अग्रिम आदेश तक के लिए लगाई जाती है। आला अफसर अस्थाई ड्यूटी लगाकर भूल जा रहे हैं। मिली जानकारी के मुताबिक गाजियाबाद जेल में अवैध मुलाकात के लिए दोषी पाए गए जेलर किशोर कुमार दीक्षित की ड्यूटी जौनपुर जेल पर लगाई गई थी। शासन में मजबूत पकड़ रखने वाले इस जेलर ने एक माह भी नहीं बीता था कि अपनी ड्यूटी मेरठ जेल पर लगवा ली। करीब छह माह से अधिक समय सेवा मेरठ में ही जमे हुए है। इन्होंने गाजियाबाद में जेलर आवास पर अभी भी कब्जा जमा रखा है। इसी प्रकार केके दीक्षित के स्थान पर बाराबंकी से अस्थाई ड्यूटी पर भेजे गए जेलर आलोक शुक्ला अभी तक वहीं पर लगे हुए है। यह तो बानगी है इस प्रकार दर्जनों की संख्या में जेल अधिकारी और सुरक्षाकर्मी एक बार अस्थाई ड्यूटी पर लगाए जाने के बाद आज तक इन्हें हटाया ही नहीं गया है।
सूत्रों की माने तो जेलों में होने वाली अवैध वसूली और भ्रष्टाचार के मामलों पर शासन और मुख्यालय स्तर पर कोई कार्रवाई हो या न हो लेकिन इन मामलों के संज्ञान में आने पर परिक्षेत्र के डीआईजी की वसूली जरूर बढ़ जाती है। बीते दिनों कन्नौज जेल में सपा की पूर्व दो ब्लॉक प्रमुखों की जेल अन्दर अन्य बंदियों के नाम पर पर्ची लगाकर मुलाकात कराए जाने का मामला सुर्खियों में आया। इस मामले में पूर्व ब्लॉक प्रमुख की जेल तो बदल दी गई किन्तु अनाधिकृत तरीके से अन्य बंदियों की पर्चियों पर मुलाकात कराने वाले अधिकारियों और कर्मियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। इससे पूर्व एटा जेल में भी परिक्षेत्र के डीआईजी ने यौन उत्पीड़न के आरोपी जेलर के खिलाफ कार्यवाही करने के बजाए उसको एटा जेल से हटाकर झांसी जेल पर अस्थाई ड्यूटी पर लगा दिया था। यह मामले विभागीय अधिकारियों और कर्मियों के बीच चर्चा का विषय बने हुए है। इसको लेकर तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही है। चर्चा है कि इन मामलो में परिक्षेत्र के डीआईजी कार्यवाही करने के बजाए वसूली करके मामलों को रफा दफा कर दिया। इस संबंध में जब प्रमुख सचिव कारागार अनिल गर्ग से संपर्क करने का प्रयास किया गया तो उनसे बात नहीं हो पाई।


