घटनाओं के बाद भी नहीं होती डीआईजी जेल पर कोई कार्यवाही!

सिर्फ अधीक्षक, जेलर, डिप्टी जेलर और वार्डर पर होती कार्यवाही कार्रवाई करने के बजाए डीआईजी को बचाने में जुटा शासन

घटनाओं के बाद भी नहीं होती डीआईजी जेल पर कोई कार्यवाही!
कारागार मुख्यालय

कारागार विभाग का अजब गजब कारनामा

लखनऊ। जेलों में घटनाएं होने पर अधीक्षक, जेलर और डिप्टी जेलर को तो निलंबित कर दिया जाता है लेकिन परिक्षेत्र के डीआईजी पर कोई कार्यवाही नहीं की जाती है। यह सवाल कारागार विभाग के अधिकारियों और कर्मियों में चर्चा का विषय बना हुआ है। इसको लेकर तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही है। चर्चा है कि ऐसा तब होता है जब जेलों के निरीक्षण की जिम्मेदारी परिक्षेत्र डीआईजी की होती है। परिक्षेत्र डीआईजी के नियमानुसार कार्यवाही नहीं किए जाने से जेलों में घटनाएं थमने के बजाए बढ़ती जा रही है। उधर विभाग के आला अफसर इस मसले पर कुछ भी बोलने से बचते नजर आए।

शासन ने कारागार विभाग के एक-एक डीआईजी जेल को कई-कई जिम्मेदारियां सौंप रखी है। आईपीएस अधिकारी राजेश कुमार श्रीवास्तव की पुलिस महकमे के साथ प्रयागराज और वाराणसी जेल परिक्षेत्र की जिम्मेदारी सौंपी गई है। सूत्रों का कहना है कि बीते दिनों परिक्षेत्र की जेलों में कई सनसनीखेज घटनाएं हुई। वाराणसी जिला जेल में महिला डिप्टी जेलर के उत्पीड़न के साथ मोटी रकम लेकर विचाराधीन बंदी की गलत रिहाई को लेकर यह जेल सुर्खियों में रही। इन घटनाओं के बाद अधीक्षक, जेलर और डिप्टी जेलर के खिलाफ कार्यवाही की गई। इसी प्रकार गाजीपुर जेल में बंदी के जेल के अंदर मोबाइल फोन इस्तेमाल करने का मामला भी सुर्खियों में रहा। इस मामले में भी अधीक्षक, जेलर और डिप्टी जेलर को निलंबित कर दिया गया। इसी प्रकार परिक्षेत्र की कौशांबी और प्रतापगढ़ जेल में निरीक्षण के दौरान भारी मात्रा में आपत्तिजनक वस्तुएं बरामद हुई इस मामले में कोई कार्यवाही नहीं की गई। केंद्रीय कारागार नैनी में माफिया अतीक के बेटे अली की बैरेक से जेल प्रशासन को नगदी और आपत्तिजनक वस्तुएं बरामद हुई इस मामले में छोटे कर्मियों के खिलाफ कार्यवाही कर मामले को निपटा दिया गया। दो परिक्षेत्र के प्रभारी डीआईजी के खिलाफ कोई कार्यवाही ही नहीं की गई।

परिक्षेत्र डीआईजी की होती यह जिम्मेदारी
विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक जेल मैनुअल में विभाग के अधिकारियों के दायित्वों विवरण दिया गया है। इसको लेकर समय समय पर शासन की ओर से निर्देश भी जारी किए जाते हैं। निर्देशों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि परिक्षेत्र डीआईजी परिक्षेत्र में आने वाली प्रत्येक जेल का दो माह के अंतराल में निरीक्षण करेंगे। तीन माह के अंतराल में एक रात्रि गश्त भी करेंगे। इसके साथ ही वह बंदियों को वितरित होने वाले नाश्ते और भोजन की गुणवत्ता की पड़ताल भी करेंगे। इसके साथ ही बंदियों को मिलने वाली रोटी, सब्जी, दाल, चावल इत्यादि का वजन कराएं और यदि बंदियों को निर्धारित वजन से कम भोजन दिया जा रहा हो तो प्रभारी जेल अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करें। इसके साथ ही कैंटीन में बिक रही खाद्य सामग्री के दामों की पड़ताल करेंगे। मासिक, दो मासिक और त्रैमासिक निरीक्षण रिपोर्ट विभागाध्यक्ष को पेश करने का प्रावधान है। सूत्रों की माने तो यह पारदर्शी व्यवस्था सिर्फ कागजों में ही सिमट कर रह गई है।

सूत्र बताते हैं कि इसी प्रकार कानपुर जेल परिक्षेत्र के पूर्व प्रभारी डीआईजी प्रेमनाथ पांडे के कार्यकाल में परिक्षेत्र की जेलों में घटनाओं का अंबार रहा। फतेहगढ़ जिला जेल में एकाएक जेल अधीक्षक और जेलर को हटा दिए जाने का मामला सुर्खियों में रहा। घटना के संबंध में जब प्रभारी डीआईजी से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि इसकी उन्हें कोई जानकारी ही नहीं है कि दोनों अधिकारियों को क्यों हटाया गया। एक सवाल पर उन्होंने कहा कि अधीक्षक और जेलर को हटाने के जिम्मेदारी मुख्यालय और शासन की होती है। उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं ही नहीं है। परिक्षेत्र के तत्कालीन प्रभारी डीआईजी को घटना की कोई जानकारी नहीं थी। इसी प्रकार ललितपुर जेल में बंद पूर्व सांसद रिजवान जहीर को लग्जरी सुविधाएं मुहैया कराने का मामला सुर्खियों में आने के बाद जब प्रभारी तत्कालीन डीआईजी से कार्यवाही के संबंध में बात की गई तो उन्होंने बताया कि विधिक सेवा प्राधिकरण की रिपोर्ट आने के बाद कार्यवाही की जाएगी। परिक्षेत्र का प्रभार मिलने के बाद से एक बार भी ललितपुर जेल का निरीक्षण नहीं करने वाले डीआईजी से जब पूछा गया कि विधिक सेवा प्राधिकरण रिपोर्ट न्यायालय को सौंपेगा या फिर आपको इस पर उन्होंने चुप्पी साध ली। यह अलग बात है कि मामले में बाद जेल के नवनियुक्त अधीक्षक, डिप्टी जेलर और वार्डर, हेड वार्डर पर कार्यवाही कर मामले को निपटा दिया गया। इसी प्रकार एटा जेल में जेलर के सरकारी आवास पर महिला के हंगामा मचाने वाली सनसनीखेज घटना में भी प्रभारी तत्कालीन डीआईजी ने आरोपी जेलर के खिलाफ कार्यवाही करने के बजाए उसे बचा लिया। आरोपी जेलर को एटा जेल से हटाकर अधिक कमाई वाली झांसी जेल पर अस्थाई ड्यूटी पर लगा दिया। कारागार विभाग के अधिकारियों और कर्मियों के बीच यह मामले चर्चा का विषय बने हुए है। चर्चा है कि घटनाएं होने के बाद अधीक्षक, जेलर, डिप्टी जेलर और वार्डरो के खिलाफ तो कार्यवाही की जाती है लेकिन परिक्षेत्र के जिम्मेदार डीआईजी के खिलाफ कोई कार्यवाही होती ही नहीं है। इस संबंध में जब प्रमुख सचिव कारागार अनिल गर्ग से संपर्क करने का प्रयास किया गया तो उनसे कई प्रयासों के बाद भी बात नहीं हो पाई।