एक बार फिर गाजियाबाद जेलर को बचाने की तैयारी!
जुलाई 2024 में अवैध मुलाकात कराने पर हटाए गए थे जेलर 30 मई को अस्थाई ड्यूटी खत्म कराकर वापस गाजियाबाद जेल पहुंचे जेलर
लखनऊ। जमानत के बाद कैदी की समय पर रिहाई न करना गाजियाबाद जेल प्रशासन को भारी पड़ सकता है। सुप्रीमकोर्ट की फटकार के बाद दिए गए जांच के आदेश से जेल प्रशासन के अधिकारियों में खलबली मची हुई है। करीब ग्यारह माह पूर्व जेल में एक असरदार बंदी की अनाधिकृत मुलाकात के मामले में जेलर को हटाया गया था। बीती 30 मई को अस्थाई ड्यूटी खत्म कराकर पुनः गाजियाबाद जेल पहुंचे जेलर को बचाने की कवायद चल रही है। कैदी की रिहाई के मामले को लेकर किन अधिकारियों पर गाज गिरेगी यह तो आने वाला समय बताएगा लेकिन मामले को लेकर विभाग में तमाम तरह की अटकलें लगाईं जा रही हैं।
जांच करने गाजियाबाद जेल पहुंचे डीआईजी
जमानत के बाद समय पर कैदी की रिहाई नहीं होने के मामले की जांच करने मेरठ जेल परिक्षेत्र के डीआईजी सुभाष शाक्य गाजियाबाद जेल पहुंचे। सूत्रों का कहना है कि जेल पहुंचे डीआईजी ने मामले को लेकर गाजियाबाद जेल अधीक्षक, जेलर और डिप्टी जेलर कई कर्मियों के बयान दर्ज किए। सूत्रों की माने तो जेलर ने मामला संज्ञान में न होने की बात कहकर पल्ला झाड़ लिया। इस संबंध में जब गाजियाबाद जेल अधीक्षक सीताराम शर्मा से बात करने का प्रयास किया गया तो उनसे संपर्क नहीं हो पाया।
ऊंची पहुंच और जुगाड़ के बल पर लखनऊ जेल पर तैनात जेलर किशोर कुमार दीक्षित (केके दीक्षित) का अचानक गाजियाबाद जेल पर तबादला कर दिया गए। जेलर के प्रभार संभालने के कुछ दिन बाद ही जेल में बंद एक दबंग बंदी की अनाधिकृत मुलाकात कराने के मामले में तत्कालीन आईजी जेल ने जेलर केके दीक्षित को सिर्फ गाजियाबाद जेल से हटाकर जौनपुर जेल पर अस्थाई ड्यूटी लगा दिया गया था। इसके अलावा इनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई थी। सूत्रों का कहना है कि करीब एक माह तक जौनपुर में ड्यूटी करने के बाद उन्होंने शासन में सेटिंग गेटिंग कर अपनी अस्थाई ड्यूटी मंडलीय कारागार मेरठ पर लगवा ली। बीती 30 मई को तत्कालीन आईजी जेल ने सेवानिवृत होने से पहले जेलर केके दीक्षित की मेरठ जेल पर लगी अस्थाई ड्यूटी को समाप्त उन्हें वापस गाजियाबाद जेल भेज दिया गया। सूत्रों का कहना है कि जेलर केके दीक्षित को गाजियाबाद जेल पहुंचे अभी एक माह भी नहीं हो पाया था कि एक नया मामला सामने आ गया। जमानत के बाद एक कैदी की समय पर रिहाई नहीं होने की वजह से उसे 28 दिनों तक जेल की सलाखों में रहना पड़ा। मामला सुप्रीमकोर्ट के संज्ञान में आने पर कोर्ट ने प्रदेश सरकार को फटकार हुए इस मामले की जांच कराकर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही किए जाने का निर्देश दिया। इसी निर्देश के तहत कोर्ट ने जमानत के बाद 28 दिनों तक जेल में रहने वाले कैदी को तत्काल पांच लाख रुपए मुआवजा दिए जाने का भी आदेश दिया। कोर्ट के इस आदेश से प्रदेश कारगार विभाग के अधिकारियों में हड़कंप मचा हुआ है। उल्लेखनीय है कि जेल में बंदियों और कैदियों के रिहाई की जिम्मेदारी जेलर और डिप्टी जेलर की होती है। मुख्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि नए जेल मैनुअल में बंदियों की रिहाई की जिम्मेदारी जेलर की होती है। उधर डीआईजी सुभाष शाक्य से काफी प्रयासों के बाद भी बात नहीं हो पाई।


