गाजीपुर, वाराणसी, लखनऊ जेल की घटनाओं ने खोली पोल!

उत्तर प्रदेश की जेलों में सुरक्षा व्यवस्था के दावों की पोल खुलती जा रही है। गाजीपुर, बागपत, लखनऊ और वाराणसी जेलों की घटनाएं अधिकारियों के दावों को झूठा साबित कर रही हैं। मोबाइल फोन का इस्तेमाल, कैदियों और जेल कर्मियों का शोषण, और भ्रष्टाचार के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। शिकायत करने वाले कर्मियों को सजा दी जा रही है, जबकि दोषी अधिकारियों को संरक्षण मिल रहा है। वाराणसी, गाजीपुर, लखनऊ, बागपत, मैनपुरी और झांसी जेलों में हुई घटनाओं के बावजूद उच्च अधिकारियों द्वारा कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है, जिससे जेल व्यवस्था पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गई है।

गाजीपुर, वाराणसी, लखनऊ जेल की घटनाओं ने खोली पोल!
कारागार मुख्यालय
  • कारागार विभाग के आला अफसरों के सुरक्षा दावे हवा हवाई

  • सनसनीखेज घटनाओं के दोषी अफसरों को क्लीन चिट देने में जुटा मुख्यालय

लखनऊ। प्रदेश को जेलों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कारागार विभाग के आला अफसरों के दावे भले ही कुछ हो लेकिन हकीकत ठीक इनके विपरीत ही है। गाजीपुर, बागपत, लखनऊ, वाराणसी जेल की घटनाओं ने अफसरों के दावों की पोल खोलकर रख दी है। दोषी अफसरों पर आला अफसरों का संरक्षण होने की वजह से जेलों की व्यवस्थाएं पूरी तरह से अस्त व्यस्त हो गई हैं। दिलचस्प यह है कि मामला सुर्खियों में आने के बाद ही मुख्यालय के आला अफसर कार्रवाई करते है। कार्रवाई नहीं होने से विभाग के अधिकारी बेलगाम हो गए हैं।

कारागार मुख्यालय के अफसर समय समय पर दावा करते है कि जेलों के सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद है। जेलों में मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। इन दावों की हकीकत जगजाहिर हो गई है। बंदियों के उत्पीड़न के साथ अब जेलों में जेल अधिकारियों और कर्मियों का भी शोषण किया जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि इस विभाग में दोषियों के खिलाफ कार्यवाही करने के बजाए शिकायत करने वाले कर्मियों को ही निपटा दिया जाता है। वाराणसी जेल इसका जीता जागता उदाहरण बन गया है। इस जेल पर शिकायत करने वाली तीन महिलाओं को ही अन्यत्र की जेलों पर स्थानांतरित कर दिया गया। मामला सुर्खियों में आने के बाद भी शासन और कारागार मुख्यालय के आला अफसरों ने जांच की बात कहकर चुप्पी साध रखी है।

जिम्मेदार अफसर नहीं उठाते फोन

गाजीपुर, बागपत, लखनऊ और वाराणसी जेल में हुई घटनाओं पर कार्रवाई के संबंध में जब प्रमुख सचिव कारागार अनिल गर्ग से बात करने का प्रयास किया गया तो काफी प्रयासों के बाद भी उनसे संपर्क नहीं हो पाया। इसी प्रकार डीजी पुलिस/आईजी जेल पीवी रामाशास्त्री से संपर्क करने का प्रयास किया गया तो उनका फोन ही नहीं उठा।

इसी प्रकार गाजीपुर जेल के अंदर से मोबाइल फोन से धमकी दिए जाने के मामले ने जेलों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल न होने के दावों की पोल खोल दी है। मामला सुर्खियों में आने के बाद हरकत में आए कारागार मुख्यालय के अधिकारियों ने जेलर और डिप्टी जेलर को निलंबित कर दिया और जेल अधीक्षक के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति की है। ऐसा तब किया गया है जब पूर्व में मुख्यालय के आईजी जेल ने पुलिस का सहयोग नहीं करने के लिए जौनपुर के जेल अधीक्षक को जौनपुर जेल से हटाकर कारागार मुख्यालय में अटैच कर दिया था। जौनपुर जेल का अतिरिक्त प्रभार गाजीपुर जेल अधीक्षक को सौंप दिया गया था।

इसी प्रकार लखनऊ जेल के पूर्व अधीक्षक के कार्यकाल में दर्जनों की संख्या में घटनाएं हुई। प्रदेश के बहुचर्चित शाइन सिटी मामले की जांच, गल्ला गोदाम से 35 लाख की नगद बरामदगी, इटावा जनपद के बंदी की गलत रिहाई पर एडीजे की जांच में दोषी पाए जाने के बावजूद इनके खिलाफ आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गई। सूत्रों की माने तो शासन और मुख्यालय में सैटिंग गेटिंग रखने वाले इस अधीक्षक को कई सनसनीखेज मामलों में क्लीन चिट तक दे दी गई है। दिलचस्प बात तो यह है कि इस दोषी अधीक्षक को ग्रेड वन से ग्रेड टू पद पर प्रमोशन देने की तैयारी है। बागपत जेल में महिला जेलर के महिला बंदी से अवैध वसूली मांगने और उत्पीड़न किए जाने के मामले में भी मुख्यालय स्तर से कोई कार्रवाई नहीं की गई। मैनपुरी और झांसी जेल में 48 घंटे के अंदर दो दो बंदियों की मौत होने के बाद भी आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। कार्रवाई नहीं होने से अधिकारी तो बेलगाम हो ही गए इसके साथ ही साथ जेलों की व्यवस्थाएं सुधरने के बजाए बिगड़ती ही जा रही हैं।