बेटों ने पिता को बंद कराया, जेल अधीक्षक ने छुड़ाया
103 वर्ष के बुजुर्ग को जेल की सलाखों से मिली आजादी रिहा हुए बुजुर्ग के कपड़े,खाने पीने, रहने की हुई व्यवस्था
शाहजहांपुर जेल की सराहनीय पहल
लखनऊ/शाहजहांपुर। जमीन बंटवारे को लेकर बेटों ने बुजुर्ग पिता को जेल भेजवा दिया। 103 वर्ष के इस बुजुर्ग का दर्द सुनकर जेल अधीक्षक ने संस्था के सहयोग से बुजुर्ग को जमानत पर रिहा करा दिया। जेल प्रशासन के अदम्य सहयोग से बुजुर्ग पिता को जेल की सलाखों से आजादी मिल गई। पिछले एक साल से जेल में बंद इस बुजुर्ग को जेल से औपचारिक कार्यवाही के बाद रिहा कर दिया गया। दिलचस्प बात यह है कि रिहा हुए बुजुर्ग के रहने, खाने पीने, कपड़े इत्यादि की व्यवस्था भी संस्था ने की है।
मामला प्रदेश की शाहजहांपुर जेल का है। बीते एक वर्ष से अधिक समय से निरुद्ध अत्यंत बुजुर्ग व जीर्ण शीर्ण बंदी गुरदीप सिंह जेल में निरुद्ध है। विगत वर्ष माह नवंबर में जेल में निरुद्ध इस एक बंदी से जेल अधीक्षक मिजाजी लाल मिले। बंदी से बातचीत के दौरान उन्हें जानकारी मिली कि उसे उसी के बेटों के द्वारा षड्यंत्र करके जेल में बंद कराया है। बंदी ने बताया कि मेरी उम्र 103 वर्ष है। मुझे मेरे बेटों के द्वारा ही जेल में बंद कराया है और मुझे कोई मिलने नहीं आता है। मेरे पास पहनने के लिए कपड़े जूते कोट स्वेटर आदि नहीं हैं तथा यहां तक कि मेरे पास पगड़ी के लिए भी कपड़ा नहीं है। जेल अधीक्षक ने उसे कंबल, स्वेटर, नमकीन बिस्कुट टूथपेस्ट बिस्किट साबुन तेल आदि की व्यवस्था कराई।
बुजुर्ग को रिहा कराने में लग गए छह माह: अधीक्षक
जेल की सलाखों से मुक्त कराए गए बुजुर्ग बंदी गुरदीप सिंह की रिहाई के संबंध में जब शाहजहांपुर जेल अधीक्षक से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि बंदी को रिहा कराने में छह माह से अधिक का समय लग गया। उन्होंने बताया कि बुजुर्ग बंदी के बेटे नहीं चाहते थे कि उनके पिता जेल से रिहा हो। उन्होंने बंदी की रिहाई में तमाम तरह की अड़चनें भी पैदा की। इसके बावजूद संस्था के सदस्यों ने मेहनत कर बुजुर्ग को आखिकार रिहा करा ही दिया। उन्होंने मानवता के इस कार्य को अंजाम तक पहुंचाने वाले संस्था के सभी पदाधिकारियों और सदस्यों का आभार व्यक्त किया।
बंदी ने बताया कि मेरी गलती सिर्फ ये है कि मैं कुछ जमीन गुरुद्वारा को दान में देना चाहता था। अधीक्षक ने बंदी गुरदीप सिंह को जेल से रिहा कराने के लिए स्वयं सेवी संगठन "सहयोग संस्था" से संपर्क किया गया सहयोग संस्था ने 15 दिन में न्यायालय से बंदी गुरदीप सिंह की जमानत करा दी और जमानतदार भी दाखिल कर दिए यह बात गुरदीप सिंह के बेटों को पता लगी तो उन्होंने अपनी जमानत दाखिल करने के लिए आवेदन पत्र दाखिल कर दिया और फिर उन जमानतों का सत्यापन नहीं कर रहे थे ताकि बंदी गुरदीप सिंह जेल से रिहा न हो जाए। सहयोग संस्था की टीम लगातार लगी रही। जिसमें अधिवक्ता जितेंद्र सिंह एवं मोहम्मद शाहनवाज पैरवी कर रहे थे। और अंत यह बंदी गुरदीप सिंह को कारागार से रिहा करने में कामयाब रहे जेल प्रशासन सहयोग संस्था का विशेष धन्यवाद ज्ञापित करता है कि कि ऐसे बुजुर्ग जिनकी कोई सहायता करने वाला नहीं था क्योंकि उन्हें उसके बेटों ने ही जेल में डलवाया था उसकी मदद की और इस उम्र के अंतिम पड़ाव में उन्हें जेल की सलाखों से आजादी दिला दी। अधीक्षक ने बताया कि सहयोग संस्था ने बंदी गुरदीप सिंह को कारागार से रिहा कराने के बाद उनके आगे की भी रहने खाने एवं अन्य आवश्यकताओं की जिम्मेदारी ली है।


