"लखनऊ की विरासत: 12 घंटे तक सिकते कबाब और 'बाबा का ढाबा' की कहानी"
लखनऊ के चंदरनगर स्थित 'बाबा का ढाबा' 2003 से वेज कबाब-पराठे का अनोखा स्वाद परोस रहा है। शिव कुमार बाबा द्वारा शुरू किया गया यह ढाबा अपने खास मसालों, फलों के जायके और खट्टी-मीठी चटनी के लिए मशहूर है। सुबह 12 से रात 12 बजे तक यहां कबाबों का सिलसिला चलता है। 25 रुपये प्रति कबाब और पराठे की कीमत के साथ, यह ढाबा न केवल लखनऊ बल्कि एयरपोर्ट तक चर्चा में रहता है। 'बाबा का ढाबा' अब स्वाद और परंपरा का पर्याय बन चुका है।
लखनऊ। उत्तरप्रदेश में लखनऊ का नाम आते ही नवाबी तहज़ीब और यहां के व्यंजनों की खुशबू हर किसी के मन में ताजा हो उठती है। लेकिन जब बात वेज कबाब-पराठा की हो, तो इस स्वाद को एक नया आयाम देने का श्रेय 2003 में बाबा का ढाबा को ही जाता है। मौनी बाबा मंदिर के पास स्थित इस छोटे से ढाबे ने अपनी शुरुआत एक साधारण खुंचे (ठेले) से की थी। इस यात्रा को गली-गली घूमते हुए और धीरे-धीरे लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाते हुए, यह आज एक प्रतिष्ठित नाम बन चुका है।
इस अनूठे स्वाद के जनक शिव कुमार बाबा का संबंध न केवल व्यंजनों से, बल्कि आध्यात्मिकता से भी गहराई से जुड़ा है। वे बाराबंकी स्थित प्रसिद्ध महाकोटवाधाम के महंत के शिष्य हैं। सुबह का समय वे अपने ढाबे पर बिताते हैं और हर कबाब को बनाने में उनकी व्यक्तिगत छाप दिखाई देती है। उनकी खासियत न केवल सब्जियों के सही संयोजन में है, बल्कि वे फलों का जायका भी कबाब में समाहित करते हैं।
2003 में जब इस स्वाद यात्रा की शुरुआत हुई, तब एक कबाब की कीमत महज 3 रुपये और पराठे की कीमत भी 3 रुपये थी। रुमाली रोटी केवल 2 रुपये में मिलती थी। तब से लेकर आज तक, यह ढाबा हर उम्र और वर्ग के लोगों के लिए स्वाद का केंद्र बना हुआ है।
आज शिव कुमार बाबा के साथ उनकी दूसरी पीढ़ी के प्रतिनिधि मनोज कुमार भी इस विरासत को संभाल रहे हैं। मनोज न केवल इस परंपरा को बनाए रख रहे हैं, बल्कि इसे आधुनिक स्वरूप भी दे रहे हैं।
बाबा का कबाब अब केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है। इसकी लोकप्रियता का आलम यह है कि लखनऊ एयरपोर्ट पर भी इसका जिक्र होता है। सुबह 12 बजे से शुरू होकर रात 12 बजे तक यहां कबाबों के सिकने का सिलसिला चलता रहता है।
यहां के कबाब की खासियत उनकी अनोखी चटनी है, जिसमें खटास का ऐसा संतुलन है कि वह हर कबाब को लाजवाब बना देती है। वर्तमान में, एक पीस कबाब और पराठा 25 रुपये में उपलब्ध है, जो इसकी गुणवत्ता और स्वाद को देखते हुए एक उचित कीमत मानी जाती है।
लोकेशन और नाम
आउटलेट का नाम: बाबा का ढाबा
स्थान: चंदरनगर, मौनी बाबा मंदिर के पास
स्थानीय लोग इस जगह को स्वाद और गुणवत्ता का मंदिर मानते हैं। बाबा के ढाबे का कबाब-पराठा केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि लखनऊ की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा बन चुका है।
अगर आपने अभी तक बाबा का ढाबा का कबाब-पराठा नहीं चखा है, तो यह लखनऊ के स्वाद का एक अभिन्न हिस्सा है जिसे मिस नहीं किया जाना चाहिए। आपकी क्या राय है? क्या आप इस जगह के कबाब और पराठा का जायका लेने को उत्सुक हैं?


