बांग्लादेशी कैदी की गलत रिहाई का मामला : डीआईजी की जांच रिपोर्ट के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं, कार्यवाही के मामले में शासन अपना रहा दोहरा मापदंड

हकीकत यह है कि शासन अफसरों पर कार्यवाही के मामले में दोहरा मापदंड अपना रहा है। इससे से विभागीय अफसरों में खासा आक्रोश व्याप्त है। इसको लेकर तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही है। उधर एसीएस होम इस गंभीर मसले पर चुप्पी साधे हुए है।…

बांग्लादेशी कैदी की गलत रिहाई का मामला : डीआईजी की जांच रिपोर्ट के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं, कार्यवाही के मामले में शासन अपना रहा दोहरा मापदंड
जिला जेल लखनऊ

लखनऊ। राजधानी की जिला जेल से  बांग्लादेशी गलत रिहाई के मामले में डीआईजी जेल की जांच रिपोर्ट के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं की गई है। ऐसा तब है जब प्रदेश के एडीजी लॉ एंड ऑर्डर ने इस लापरवाही के लिए दोषी जेल अफसरों के खिलाफ कार्यवाही की संस्तुति की थी। वही दूसरी ओर चार साल पहले नोएडा से एक बन्दी की गलत रिहाई के मामले में तत्कालीन जेल अधीक्षक को निलंबित कर दिया गया। हकीकत यह है कि शासन अफसरों पर कार्यवाही के मामले में दोहरा मापदंड अपना रहा है। इससे से विभागीय अफसरों में खासा आक्रोश व्याप्त है। इसको लेकर तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही है। उधर एसीएस होम इस गंभीर मसले पर चुप्पी साधे हुए है।

चार साल पहले बन्दी की गलत रिहाई  मामले में अधीक्षक निलंबित : मिली जानकारी के मुताबिक बीते करीब एक माह पूर्व राजधानी की  जिला जेल से सजायाफ्ता बांग्लादेशी कैदी को आम बन्दियों की तरह रिहा कर दिया। ऐसा तब किया गया जब रिहा होने वाले बांग्लादेशी (विदेशी) कैदी को एलआईयू को सुपुर्द किये जाने का नियमों में प्रावधान है। विदेशी कैदी की रिहाई की सूचना मिलते ही पुलिस महकमे के अधिकारियों में हड़कंप मच गया। एडीजी कानून व्यवस्था ने इस लापरवाही के लिए दोषी जेल अफसरों के खिलाफ कार्यवाही की संस्तुति की। सूत्रों का कहना है कि डीजी जेल ने इस लापरवाही की जांच लखनऊ परिक्षेत्र के डीआईजी जेल को सौंपी। सूत्रों का कहना है कि एक पखवाड़े पहले लखनऊ परिक्षेत्र के डीआईजी जेल ने मामले की जांच कर रिपोर्ट डीजी जेल को सौंप दी। जांच रिपोर्ट मिलने के बाद भी अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की गई है। सूत्रों की मानें तो चहेते अधिकारी को बचाने के लिए जांच रिपोर्ट को दबा दिया गया है। ऐसा पहली बार नही हुआ है। इससे पहले भी जेल में 35 लाख रुपये की नगद धनराशि बरामद होने के मामले की भी तत्कालीन डीआईजी जेल ने जांच की थी। उस मामले में भी दोषियों के खिलाफ अभी तक कोई कार्यवाही नही की गई। बताया गया है कि जांच अधिकारी ने मोटी रकम लेकर पूरे मामले को ही निपटा दिया। ऐसा तब किया गया जब जेल के अंदर नगद धनराशि की बात तो छोड़िए सुई व ब्लेड तक ले जाना पूरी तरह से प्रतिबंधित है।

वही दूसरी ओर नोएडा जेल में करीब चार साल पहले सुप्रीमकोर्ट के रिहाई पर रोक लगाने व हाइकोर्ट से रिहाई आदेश मिलने पर विचाराधीन बन्दी मनोज कुमार को जेल अधिकारियों ने जेल से रिहा कर दिया। मामला न्यायालय से जुड़ा होने के कारण शासन में बैठे जेल विभाग के आला अफसरों ने आनन फानन में तत्कालीन जेल अधीक्षक विपिन मिश्रा को निलंबित कर दिया। सूत्रों का कहना है कि ऐसा तब किया गया है जब विचाराधीन बन्दी के रिहाई की जिम्मेदारी जेलर व डिप्टी जेलर की होती है। सजायाफ्ता कैदी की रिहाई की जिम्मेदारी अधीक्षक की होती है। शासन में बैठे अफसरों के कार्यवाही में दोहरा मापदण्ड अपनाने व तानाशाही से अफसरों में खासा आक्रोश व्याप्त है। चहेते अफसरों को बचाने के लिए बेतरतीब तरीके से की जा रही कार्यवाहियों को लेकर तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही है। उधर इस संबंध में एसीएस होम अवनीश अवस्थी से काफी प्रयासों के बाद भी संपर्क नही हो पाया।

डीआईजी कहते है कि हो जाएगी इसमे भी चार साल बाद कार्यवाही

लखनऊ। जेल विभाग के चहेते दोषी अफसरों को बचाने में शासन व मुख्यालय में बैठे अफसरों को महारत हासिल है। लखनऊ जेल से विदेशी कैदी की गलत रिहाई के संबंध में जब लखनऊ परिक्षेत्र के डीआईजी जेल शैलेन्द्र मैत्रेय से बात की गई तो उन्होंने कहा कि जांच रिपोर्ट डीजी को सौंप दी गयी है। नोएडा में कार्यवाही के सवाल पर उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा जिस प्रकार उस मामले में चार साल बाद कार्यवाही हुई है इसमे भी हो जाएगी, जल्दी किस बात की है। उधर इस संबंध में जब डीजी जेल आनंद कुमार से पूछा गया तो उन्होंने कोई जवाब ही नहीं दिया।.....

राकेश यादव
स्वतंत्र पत्रकार
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